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इटावा – अपनी मेहनत से लाई हूँ 83 % नम्बर, अब भविष्य में मुझे डॉक्टर भी बनना है – सोनम

इटावा चर्चा में शिक्षा

इटावा – कोई प्रतिभा सिर्फ बड़े बड़े बंगलो या किसी आलीशान कोठी की ही बपौती मात्र नही होती, प्रतिभा गरीब की कोख से भी जन्म ले ही सकती है बस उसे हमारा आपका सहारा और साथ ही चाहिये। किसी की किस्मत भी हमारे आपके सहयोग व प्रयास से ही बनती है अतः ऐसे बच्चों की मदद के लिये अवश्य ही आगे आइये।

आपको बता दें कि, जनपद इटावा में एक ऐसी ही गरीब की मेधावी बेटी है सोनम जिसके माता पिता सड़क किनारे पॉलीथिन के बने टूटे फूटे घर मे रहते है व दिन भर मेहनत कर शहर से लोहे का कचरा बीनकर छोटा मोटा सामान बनाकर बेंचते है, कभी कुछ बिकता है कभी नही। वहीं प्रतिभाशाली बेटी सोनम पढ़ाई के साथ साथ माँ बाप का काम मे हाथ भी बटाती है।

एक दिन हमारी नजर अचानक ही इस गरीब बच्ची पर पड़ी जो मन मे कई सवाल लिये परिवार के साथ गुमसुम किनारे खड़ी थी। अचानक उससे पूछा पढ़ती हो बेटा की नही तो उसका दो टूक जवाव था जी अभी 11 में हूँ कक्षा 10 में मेहनत से 83 % नम्बर से पास हुई हूँ। लेकिन आज सुबह से हमारा कोई समान भी नही बिका इसलिये किसी ने कुछ खाया भी नही है तब मैंने उसछोटी सी बच्ची की छोटी सी मदद की लेकिन उसमें स्वाभिमान कूट कूट कर भरा था क्यों कि वह उन्हीं वीर महाराणा प्रताप की वंशज जो है जिनके वीरता व स्वाभिमान के किस्से इतिहास के पन्नो में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

असल मे सोनम ऐसी ही एक स्वाभिमानी बच्ची है जो अपनी गरीबी में भी हार नही मान रही अपनी गरीबी से लड़कर कुछ कर दिखाने का जज्बा उसकी आँखों मे चमकता है। विशेष बात यह है कि समाज के इस बेहद पिछड़े तबके लोहार समाज मे बेटियों को कभी भी पढ़ाया ही नही जाता है उस समाज के लिये सोनम हमारी आपकी मदद से एक नई पीढ़ी एक नई शुरुवात एक नई उम्मीद बनकर सामने आ सकती है ।

घर मे पिता राजू व माता गुंजन देवी संग दो भाई सूरज व राहुल भी रहते है सूरज और राहुल की शादी हो गई है पूछने पर उसने बताया कि उसके पास कभी किताबें खरीदने के लिये पूरे पैसे नही होते पढ़ाई की पूरी किताबें खरीदने के लिये जितने भी पैसे कभी इकठ्ठे हो जाते है बस उतनी ही किताबें ले पाती हूँ। लेकिन अभी भी मेरे पास पूरी किताबें नही है। उसने अपने सपने के बारे में बताया कि, वह बायलॉजी की छात्रा है व पढ़ लिखकर बस डॉक्टर ही बनना चाहती है। सोनम के अनपढ़ पिता राजू लोहार का यह कहना है कि चाहे हमारा खून तक बिक जाये साहब लेकिन में अपनी बच्ची को जरूर पढ़ाऊंगा और उसे डॉक्टर बनाऊंगा।

अब देखना यह है होगा कि जनपद की कई रजिस्टर्ड सामाजिक संस्थाये इस बच्ची के डॉक्टर बनने के सपने को पूरा करने में कितना आगे आती है। शहर में जगह जगह लिखे स्लोगन बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ संगठन के पदाधिकारीयो सहित अन्य सामाजिक संस्थाओ व कुछ शिक्षकों व समाजसेवियों को भी अब इस बच्ची की मदद के लिये आगे आना ही चाहिये। शायद आपकी कोई छोटी सी सहायता इस बच्ची के सपनों को बड़े पंख बड़ी उड़ान दे दे।

मैंने आज उस बच्ची की बात अपनी कलम से आप सब तक पहुंचा दी अब आगे इस बेटी के लिये जनपद के समाजसेवियों की भी कुछ जिम्मेदारी भी बनती ही है।

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