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टिक्सी टेंपिल – धूमेश्वर महादेव मंदिर, इटावा

इटावा पर्यटन

इटावा : शहर के दक्षिणी किनारे स्थित टिक्सी मंदिर जनपद की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर में शामिल है। मराठा शैली में निर्मित इस मंदिर में वशिष्ठ मुनि द्वारा शिवलिंग स्थापित है। पानीपत के तीसरे युद्ध में अहमदशाह अब्दाली का साथ देने वाले इस क्षेत्र के नवाबों को हराने की मन्नत पूरी होने पर मंदिर का निर्माण कराया गया था।


1780 में निर्माण कार्य पूर्ण हुआ था, तब से यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। जनश्रुति के मुताबिक प्राचीन काल में यह क्षेत्र बीहड़ का जंगल था, वशिष्ठ मुनि ने यहां पर वशिष्ठेश्वर महादेव की स्थापना की थी। शिवलिंग धरातल से ऊंचाई पर था, सिद्ध स्थल होने से शिव भक्त यहां आकर पूजा-अर्चना तपस्या करते थे।

इस स्थल से करीब 500 मीटर की दूरी पर यमुना नदी के घाट स्थापित हैं। उस दौरान ग्वालियर-भिंड की ओर आवागमन करने वाले नदी में नाव के माध्यम से आवागमन करते थे। मराठा सरदार सदाशिव भाऊ कन्नौज तथा फर्रुखाबाद में नवाबों को खात्मा करने के लिए सेना सहित 1772 में यमुना नदी पर आकर रुका था। उस समय नवाबों का भी मजबूत सैन्य संगठन था।

उस समय कुछ श्रद्धालुओं ने मराठा सरदार को इस शिवलिंग पर रुद्रीय अभिषेक करके अपनी विजय सुनिश्चित करने की सलाह दी। मराठा सरदार ने पूजा और अर्चना करके मन्नत मांगकर नवाबों को हरा दिया था ।

तब इस मंदिर की महिमा मानकर मराठा सरदार ने मराठा शैली में ही शिवलिंग तक सीढि़यों सहित मेहराबदार छत का निर्माण कराया था । 1780 में निर्माण पूरा होना इटावा के गजेटियर में दर्ज है।

टिकरी से बना टिक्सी, प्रमुख साहित्यकार डा. कुश चतुर्वेदी का कहना है कि टिक्सी मंदिर के नाम से पुकारे जाने को लेकर विद्वान एकमत नहीं हैं, किवदंतियों के मुताबिक वशिष्ठेश्वर महादेव शिवलिंग खुले में थे। ग्रीष्मकाल में शिवभक्त शिवलिंग पर टिकरी यानी तिपाई पर कलश रखकर शिवलिंग पर जल की बूंदे टपकते रहने की व्यवस्था करते हैं।

उस समय टिकरी रखी जाने से टिकरी वाले मंदिर के नाम से मंदिर मशहूर हुआ जो अंग्रेजों का दौर आने पर टिकरी से टिक्सी टेंपिल के नाम से मशहूर हुआ।

इस मंदिर पर धरातल से सीढि़या काफी हैं, महाराष्ट्र की लोकभाषा में सीढ़ी को टिक्सी भी कहते हैं इससे टिक्सी मंदिर का नाम पड़ा।

बहरहाल दौर के अनुरूप इस मंदिर का नाम बदलता रहा वर्तमान में टीटी मंदिर पुकारा जा रहा है।

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